भारत के एंटी-सैटेलाइट मिसाइल परीक्षण के बाद अमरीका के कार्यवाहक रक्षा मंत्री पैट्रिक शानाहान ने अंतरिक्ष में कचरा बढ़ने को लेकर आगाह किया है.
पैट्रिक का कहना है कि इस तरह के परीक्षण से अंतरिक्ष में 'कचरा' पैदा होता है. बुधवार को भारत ने अपने ही उपग्रह को मार गिराया था.
पैट्रिक का कहना है कि अमरीका इस बात का अध्ययन कर रहा है, जिसमें भारत ने कहा है कि उसने अंतरिक्ष में कचरा नहीं छोड़ा है.
अमरीका, रूस और चीन के बाद भारत चौथा ऐसा देश है जिसने इस तरह का परीक्षण किया है.
चीन ने साल 2007 में एंटी सैटेलाइट मिसाइल का परीक्षण किया था, जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी काफ़ी आलोचना हुई थी.
भारत के परीक्षण के बाद पैट्रिक ने संवाददाताओं से कहा, "हमारा मानना है कि हम सभी अंतरिक्ष में रहते हैं और इसमें कचरा नहीं फैलाना चाहिए. अंतरिक्ष एक जैसी जगह होनी चाहिए जहां हम व्यापार कर सकें. अंतरिक्ष एक जैसी जगह हो जहां लोगों को काम करने की स्वतंत्रता हो."
इस तरह के परीक्षण से अंतरिक्ष में कचरा बढ़ता है जो नागरिक और सैन्य उपग्रहों को नुक़सान पहुंचा सकता है.
हालांकि भारत का कहना है कि उसने जानबूझकर 'मिशन शक्ति' का परीक्षण कम ऊंचाई पर किया है ताकि कचरा अंतरिक्ष में ना रहे और तत्काल पृथ्वी पर गिर जाए.
कुछ विशेषज्ञों ने भारत के इस दावे पर संदेह जताया है. उनका कहना है कि मलबे को नियंत्रित नहीं किया जा सकता है और वो किस ओर जाएगा, यह कहना मुश्किल है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने अमरीकी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता के हवाले से कहा है कि अमरीकी सेना भारत के इस परीक्षण से उत्पन्न मलबे के 250 टुकड़ों की निगरानी कर रही है.
चीन ने यह पीरक्षण 2007 में किया था. उसने इस परीक्षण में एक पुराने मौसम उपग्रह को 865 किलोमीटर की ऊंचाई पर मार गिराया था. चीन के इस परीक्षण से अंतरिक्ष में बड़े पैमाने पर कचरा पैदा हुआ था. नासा ने भारत के परीक्षण से भी कचरा बढ़ने की चेतावनी दी है.
अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी के प्रमुख जिम ब्रिडेंस्टाइन ने बुधवार को कांग्रेस से कहा, ''कुछ लोग एंटी-सैटलाइट परीक्षण जानबूझकर करते हैं और अंतरिक्ष में कचरा फैलाते हैं. हम इस समस्या से पहले से ही जूझ रहे हैं.''
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को ऐलान किया कि भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में दुनिया की चौथी महाशक्ति बन गया है.
हथियारों पर नियंत्रण की वकालत करने वाले लोगों ने अंतरिक्ष में बढ़ते सैन्यीकरण पर चिंता जाहिर की है.
हालांकि भारत के विदेश मंत्रालय ने परीक्षण को शांतिपूर्ण बताया है और कहा है कि इसका "अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ में शामिल होने का कोई इरादा नहीं है."
भारत के विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा पर नाराज़गी जताई है. उनका कहना है कि वो वैज्ञानिकों की सफलता को मोदी अपने चुनावी फ़ायदे के लिए भुनाना चाहते हैं.
भारत में लोकसभा चुनाव 11 अप्रैल से शुरू हो रहे हैं.
भारतीय चुनाव आयोग ने कहा है उसे कई शिकायतें मिली हैं और वो इस बात की जांच करेगा कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव के नियमों का उल्लंघन किया है या नहीं.
Thursday, March 28, 2019
Friday, March 22, 2019
लालकृष्ण आडवाणी का युग अब ख़त्म हो गया है: नज़रिया
भारतीय जनता पार्टी ने गुरुवार को 2019 लोकसभा चुनाव के लिए 184 उम्मीदवारों की अपनी पहली सूची जारी कर दी. इसमें गांधीनगर सीट से लालकृष्ण आडवाणी की जगह अमित शाह का नाम घोषित किया गया है.
आडवाणी इस सीट से 1998 से चुने जीतते रहे थे लेकिन पार्टी ने इस बार उन्हें मौका नहीं दिया है.
यह एक तरह से नैचुरल ट्रांजिशन है. आडवाणी अब उस स्थिति में नहीं है जो सक्रिय रूप से प्रचार अभियान चला सकें.
चुनाव में जिस तरह से पसीना बहाना पड़ता है, धूल फांकनी पड़ती है, उसके लिए आडवाणी की उम्र कुछ ज़्यादा है.
इसे बीजेपी का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के हाथ में जाने के तौर पर देखा जा सकता है और कुछ नहीं.
अमित शाह और आडवाणी की तुलना उचित?
आडवाणी की सीट पर अमित शाह के लड़ने पर कुछ लोग भले ही ये कहें कि बीजेपी अध्यक्ष का क़द आडवाणी के बराबर हो गया है लेकिन किसी सीट पर लड़ने से किसी का कद न बढ़ता है और न ही छोटा होता है.
अगर यही पैमाना होता तो आपको वाराणसी से कोई भी ऐसा नेता आपको याद नहीं होगा जिसका क़द प्रधानमंत्री तक जाता हो.
वाराणसी से मोदी के चुने जाने का ये मतलब नहीं है कि वे सीट की वजह से बड़े हो गए. ये नेता की अपनी शख़्सियत पर निर्भर करता है.
सीट का नेता के क़द से कोई रिश्ता नहीं होता. वैसे ही गांधीनगर से अमित शाह लड़ रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि वे भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष हैं.
गांधीनगर से चुनाव लड़ने की वजह से अमित शाह की तुलना आडवाणी से करना उचित नहीं होगा. इसकी कई वजहें हैं.
एक वजह तो ये है कि ज़माना बदल गया है. लीडरशिप के तौर-तरीके बदल गए हैं.
आडवाणी और अमित शाह दोनों अलग-अलग हैं. आडवाणी का क़द कहीं ज़्यादा बड़ा है. अमित शाह को वहां तक पहुंचने में काफ़ी वक़्त लगेगा.
लेकिन ये एक तरह से आडवाणी युग का अंत होने जैसा है. इसमें कोई शक़ भी नहीं रह गया है.
सबका ढलान का वक़्त आता है
साल 2009 के चुनाव के बाद से ही ये स्पष्ट होने लगा था कि उस ज़माने के नेताओं का समय अब पूरा हो गया है.
किसी की उम्र 90 साल हो गई हो और ये सोचना कि उसका युग रहेगा, तो ये बहुत बड़ी बात हो जाएगी.
क्रिकेट में खिलाड़ी अपने रिटायरमेंट के फ़ैसले ख़ुद लेते हैं लेकिन राजनेताओं की विदाई के लिहाज़ से देखा जाए तो जिस तरह से आडवाणी ढलते चले गए कि अब कोई उनकी बात भी नहीं करता है.
हर किसी की ज़िंदगी में ढलान का वक़्त आता है. ये नहीं कहा जा सकता कि इस समय पूछ घट गई है या उस समय पूछा जा रहा था.
अगर आप याद करें तो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में हरकिशन सिंह सुरजीत हुआ करते थे. वह लंबे समय तक राजनीति में सक्रिय रहे लेकिन आख़िरी दौर में वह भी फ़ीके पड़ गए थे.
जॉर्ज फर्नांडिस के साथ भी ऐसा ही हुआ था. ये जीवन का प्राकृतिक चक्र है और इसे बदला नहीं जा सकता. यह तो नहीं कह सकते कि हम अतीत में जीते रहें और यह सोचें कि 30 साल पहले उनका क़द बहुत बड़ा था. लिहाज़ा अब भी उन्हें वैसा ही रखा जाए.
किसी का क़द उसके वक़्त से जुड़ा होता है. वक़्त के बदलने से चीज़ें बदल जाती हैं.
अमित शाह के गांधीनगर से लड़ने के फ़ैसले पर ये भी कहा जा रहा है कि वह मोदी सरकार के दोबारा चुने जाने की सूरत में पार्टी में नंबर दो की हैसियत से सरकार में नंबर दो के ओहदे पर आ सकते हैं.
हालांकि इस पर फ़िलहाल कुछ कहना कयास लगाने जैसी बात होगी. कैबिनेट में किसी को लेने का फ़ैसला प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार होता है.
साल 2019 का चुनाव उन्हीं की अध्यक्षता में हो रहा है, इसलिए इससे कोई इनकार नहीं करेगा कि उनकी अहम भूमिका रहेगी.
आडवाणी इस सीट से 1998 से चुने जीतते रहे थे लेकिन पार्टी ने इस बार उन्हें मौका नहीं दिया है.
यह एक तरह से नैचुरल ट्रांजिशन है. आडवाणी अब उस स्थिति में नहीं है जो सक्रिय रूप से प्रचार अभियान चला सकें.
चुनाव में जिस तरह से पसीना बहाना पड़ता है, धूल फांकनी पड़ती है, उसके लिए आडवाणी की उम्र कुछ ज़्यादा है.
इसे बीजेपी का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के हाथ में जाने के तौर पर देखा जा सकता है और कुछ नहीं.
अमित शाह और आडवाणी की तुलना उचित?
आडवाणी की सीट पर अमित शाह के लड़ने पर कुछ लोग भले ही ये कहें कि बीजेपी अध्यक्ष का क़द आडवाणी के बराबर हो गया है लेकिन किसी सीट पर लड़ने से किसी का कद न बढ़ता है और न ही छोटा होता है.
अगर यही पैमाना होता तो आपको वाराणसी से कोई भी ऐसा नेता आपको याद नहीं होगा जिसका क़द प्रधानमंत्री तक जाता हो.
वाराणसी से मोदी के चुने जाने का ये मतलब नहीं है कि वे सीट की वजह से बड़े हो गए. ये नेता की अपनी शख़्सियत पर निर्भर करता है.
सीट का नेता के क़द से कोई रिश्ता नहीं होता. वैसे ही गांधीनगर से अमित शाह लड़ रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि वे भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष हैं.
गांधीनगर से चुनाव लड़ने की वजह से अमित शाह की तुलना आडवाणी से करना उचित नहीं होगा. इसकी कई वजहें हैं.
एक वजह तो ये है कि ज़माना बदल गया है. लीडरशिप के तौर-तरीके बदल गए हैं.
आडवाणी और अमित शाह दोनों अलग-अलग हैं. आडवाणी का क़द कहीं ज़्यादा बड़ा है. अमित शाह को वहां तक पहुंचने में काफ़ी वक़्त लगेगा.
लेकिन ये एक तरह से आडवाणी युग का अंत होने जैसा है. इसमें कोई शक़ भी नहीं रह गया है.
सबका ढलान का वक़्त आता है
साल 2009 के चुनाव के बाद से ही ये स्पष्ट होने लगा था कि उस ज़माने के नेताओं का समय अब पूरा हो गया है.
किसी की उम्र 90 साल हो गई हो और ये सोचना कि उसका युग रहेगा, तो ये बहुत बड़ी बात हो जाएगी.
क्रिकेट में खिलाड़ी अपने रिटायरमेंट के फ़ैसले ख़ुद लेते हैं लेकिन राजनेताओं की विदाई के लिहाज़ से देखा जाए तो जिस तरह से आडवाणी ढलते चले गए कि अब कोई उनकी बात भी नहीं करता है.
हर किसी की ज़िंदगी में ढलान का वक़्त आता है. ये नहीं कहा जा सकता कि इस समय पूछ घट गई है या उस समय पूछा जा रहा था.
अगर आप याद करें तो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में हरकिशन सिंह सुरजीत हुआ करते थे. वह लंबे समय तक राजनीति में सक्रिय रहे लेकिन आख़िरी दौर में वह भी फ़ीके पड़ गए थे.
जॉर्ज फर्नांडिस के साथ भी ऐसा ही हुआ था. ये जीवन का प्राकृतिक चक्र है और इसे बदला नहीं जा सकता. यह तो नहीं कह सकते कि हम अतीत में जीते रहें और यह सोचें कि 30 साल पहले उनका क़द बहुत बड़ा था. लिहाज़ा अब भी उन्हें वैसा ही रखा जाए.
किसी का क़द उसके वक़्त से जुड़ा होता है. वक़्त के बदलने से चीज़ें बदल जाती हैं.
अमित शाह के गांधीनगर से लड़ने के फ़ैसले पर ये भी कहा जा रहा है कि वह मोदी सरकार के दोबारा चुने जाने की सूरत में पार्टी में नंबर दो की हैसियत से सरकार में नंबर दो के ओहदे पर आ सकते हैं.
हालांकि इस पर फ़िलहाल कुछ कहना कयास लगाने जैसी बात होगी. कैबिनेट में किसी को लेने का फ़ैसला प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार होता है.
साल 2019 का चुनाव उन्हीं की अध्यक्षता में हो रहा है, इसलिए इससे कोई इनकार नहीं करेगा कि उनकी अहम भूमिका रहेगी.
Thursday, March 14, 2019
चीन ने फिर रोका मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकवादी घोषित करने का प्रयास
चीन ने पाकिस्तान स्थित चरमपंथी समूह जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मौलाना मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों की काली सूची में शामिल किए जाने के प्रयास को रोक दिया है.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस की ओर से मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र की आतंकियों की काली सूची में शामिल करने का प्रस्ताव पेश किया गया था.
चीन ने बुधवार को इस पर रोक लगा दी.
समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक सुरक्षा परिषद को दिए अपने नोट में चीन ने कहा है कि वो मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगाने की अपील को समझने के लिए और समय चाहता है.
ये तीसरा मौका था जब संयुक्त राष्ट्र में मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के लिए प्रस्ताव आया था.
चीन इससे पहले साल 2016 और 2017 में मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगाने के प्रयासों को रोक चुका है. अज़हर के संगठन जैश-ए-मोहम्मद को साल 2001 में ही आतंकी संगठन घोषित कर दिया गया था.
यदि उन्हें इस सूची में शामिल कर लिया जाता तो उन पर यात्रा प्रतिबंध लग जाते और उनकी अंतरराष्ट्रीय संपत्तियों को ज़ब्त कर लिया जाता.
मसूद अज़हर के संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ही हाल ही में भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में हुए चरमपंथी हमले की ज़िम्मेदारी ली थी. इस हमले में भारत के कम से कम चालीस सुरक्षा बल मारे गए थे.
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी दूत सैयद अकबरउद्दीन ने कुछ देर पहले किए ट्वीट में चीन का नाम तो नहीं लिया लेकिन संकेत ज़रूर दिया.
उन्होंने उन सभी देशों का शुक्रिया अदा किया जिन्होंने भारत के प्रयासों का समर्थन किया.
इससे पहले भी चीन अज़हर मसूद को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट करता रहा है.
23 अक्टूबर 2018 को चीन के विदेश मंत्रालय ने अपनी नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि भारत मसूद को संयुक्त राष्ट्र की आतंकवादियों की सूची में शामिल करवाना चाहता है, लेकिन इस बारे में चीन अपना रुख़ कई बार दोहरा चुका है. चीन आतंकवाद विरोधी सहयोग में हमेशा बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है और हर मामले पर उसकी मैरिट के आधार पर निर्णय लेता है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा था, "हम भारत के साथ आतंकवाद विरोधी और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करना चाहेंगे और दोनों देश मिलकर क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा पर काम करेंगे."
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस की ओर से मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र की आतंकियों की काली सूची में शामिल करने का प्रस्ताव पेश किया गया था.
चीन ने बुधवार को इस पर रोक लगा दी.
समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक सुरक्षा परिषद को दिए अपने नोट में चीन ने कहा है कि वो मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगाने की अपील को समझने के लिए और समय चाहता है.
ये तीसरा मौका था जब संयुक्त राष्ट्र में मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के लिए प्रस्ताव आया था.
चीन इससे पहले साल 2016 और 2017 में मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगाने के प्रयासों को रोक चुका है. अज़हर के संगठन जैश-ए-मोहम्मद को साल 2001 में ही आतंकी संगठन घोषित कर दिया गया था.
यदि उन्हें इस सूची में शामिल कर लिया जाता तो उन पर यात्रा प्रतिबंध लग जाते और उनकी अंतरराष्ट्रीय संपत्तियों को ज़ब्त कर लिया जाता.
मसूद अज़हर के संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ही हाल ही में भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में हुए चरमपंथी हमले की ज़िम्मेदारी ली थी. इस हमले में भारत के कम से कम चालीस सुरक्षा बल मारे गए थे.
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी दूत सैयद अकबरउद्दीन ने कुछ देर पहले किए ट्वीट में चीन का नाम तो नहीं लिया लेकिन संकेत ज़रूर दिया.
उन्होंने उन सभी देशों का शुक्रिया अदा किया जिन्होंने भारत के प्रयासों का समर्थन किया.
इससे पहले भी चीन अज़हर मसूद को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट करता रहा है.
23 अक्टूबर 2018 को चीन के विदेश मंत्रालय ने अपनी नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि भारत मसूद को संयुक्त राष्ट्र की आतंकवादियों की सूची में शामिल करवाना चाहता है, लेकिन इस बारे में चीन अपना रुख़ कई बार दोहरा चुका है. चीन आतंकवाद विरोधी सहयोग में हमेशा बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है और हर मामले पर उसकी मैरिट के आधार पर निर्णय लेता है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा था, "हम भारत के साथ आतंकवाद विरोधी और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करना चाहेंगे और दोनों देश मिलकर क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा पर काम करेंगे."
Friday, March 1, 2019
बालाकोट में भारतीय वायु सेना के हमले से कितने मरे, कितना नुक़सान हुआ?
बालाकोट में भारतीय वायु सेना की कार्रवाई के बाद भारत और पाकिस्तान दोनों ने अपने-अपने दावे पेश किए थे.
भारत ने बालाकोट में चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षण शिविर को निशाना बनाने और वहाँ मौजूद सभी चरमपंथियों के मारे जाने का दावा किया था.
वहीं पाकिस्तान ने कहा था कि वहां कोई प्रशिक्षण शिविर है ही नहीं. भारत ने खाली जगह पर बम गिराए और पाकिस्तानी वायुसेना की जवाबी कार्रवाई के बाद भारत के लड़ाकू विमान भाग गए.
दोनों ही देशों के बीच जब ये दावे चल रहे थे तो मीडिया भी अपनी-अपनी बातें कह रहा था. कुछ मीडिया चैनल्स ने तो 300 चरमपंथियों के मारे जाने तक का दावा किया था.
ऐसी ख़बरें भी थीं कि बालाकोट में चरमपंथियों के लिए छह एकड़ का शिविर बना था जिसमें कई सुविधाएं थीं और चरमपंथियों को वहां हर तरह का प्रशिक्षण मिलता था. लेकिन, निष्पक्ष तौर पर इन दावों की पुष्टि नहीं हो पाई.
अपने दावे की पुष्टि करने के लिए पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया को हमले की जगह जाबा में आने के लिए आमंत्रित किया था. जाबा बालाकोट में स्थित है. पाकिस्तानी सेना की निगरानी में मीडिया को जाबा में ले जाया गया. वहां के
हालातों पर की गईं न्यूज़ रिपोर्ट का सार पढ़ें यहां:
भारतीय हवाई हमले के बाद बीबीसी संवाददाता सहर बलोच भी बालाकोट पहुंची थीं. उन्होंने इस हमले में घायल एक स्थानीय शख़्स नूरान शाह से बात की. उनका घर घटनास्थल के पास ही है.
नूरान शाह ने बताया, ''पिछली रात मैं सोया हुआ था. उनकी बहुत तेज आवाज़ से मैं जाग गया. जब मैं उठा तो बहुत तेज धमाका हुआ. जब ये धमाका हुआ तो मैंने बाहर निकलने की कोशिश की. मैंने कहा कि ये कोई ख़तरनाक काम है.
जब मैं दरवाजे के पास आया तो तीसरा धमाका हुआ. ये जगह 15 मीटर या उससे भी कम दूर होगी.''
''दूसरे धमाके के साथ ही दरवाजे टूट गए थे. तब मैं, मेरी बेटी और बीवी वहीं बैठ गए. मैंने कहा कि अब मरना ही है. उसके बाद चौथा धमाका थोड़ा नीचे हुआ तो हम उधर ही बैठे रहे. फिर थोड़ी देर बाद हम उठे, बाहर निकले तो देखा
कि मकान की दीवारें, छत वगैरह पर दरारें थीं. बस अल्लाह ने हमें बचा लिया. मेरे सिर पर थोड़ी सी चोट आई है. टांग और कमर पर थोड़ी चोटें हैं.''
पाकिस्तानी सेना के आने पर इलाक़े की आवाजाही पर क्या असर पर पड़ा इस संबंध में इलाक़े के एक छात्र ने बताया, ''सुबह से लोगों का यहां आना मना है. फौज की तरफ़ से रोका गया है.''
इसके अलावा खैबर पख्तूनख्वाह के हेल्थ केयर कमीशन ने यहां 100 बेड अलग किए हैं, जिसके बाद से हालात ख़राब होने का अनुमान लगाया जा रहा था.
अल जज़ीरा ने क्या लिखा
कतर के न्यूज़ ब्रॉडकास्टर अल जज़ीरा ने लिखा है कि बुधवार को हमले की जगह जाने के बाद अल जज़ीरा ने पाया कि उत्तरी पाकिस्तान के जाबा शहर के बाहर जंगल और दूर दराज के क्षेत्र में चार बम गिरे थे. विस्फोट से हुए गड्ढे में
टूटे हुए पेड़ और जगह-जगह पत्थर पड़े थे. लेकिन, वहां पर किसी भी तरह के मलबे और जान-माल के नुकसान का कोई सबूत नहीं था.''
स्थानीय अस्पतालों के अधिकारियों और उस जगह पर पहुंचे कई निवासियों ने बताया कि उन्हें भारतीय हमले के बाद वहां कोई शव या घायल लोग नहीं दिखे.
इलाक़े में जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षण शिविर को लेकर स्थिति साफ नहीं थी.
स्थानीय निवासियों ने बताया कि जहां बम गिराए गए वहां से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर, एक ढलान वाली चोटी पर एक मदरसा है जिसे जैश-ए-मोहम्मद चलाता है. कुछ दूरी पर लगे एक साइनबोर्ड से स्कूल की जगह की पुष्टि
हुई और यह सशस्त्र समूह द्वारा चलाया जा रहा था.
बोर्ड में मसूद अज़हर को तलीम-उल-क़ुरान मदरसे का प्रमुख और मोहम्मद युसूफ़ अज़हर को प्रशासक बताया गया था.
यहां कुछ लोगों का कहना था कि यह मदरसा स्थानीय स्कूल के बच्चों को पढ़ाता था लेकिन कुछ ने कहा कि वहां जैश के लड़ाकों का प्रशिक्षण केंद्र था.
एक व्यक्ति ने बिना पहचान ज़ाहिर किए बताया, ''पहाड़ पर बना मदरसा मुजाहिदीनों के लिए प्रशिक्षण शिविर था.''
31 साल के एक अन्य स्थानीय शख़्स ने कहा, ''हर कोई जानता था कि वहां जैश का शिविर है. वहां लोगों को लड़ना सिखाया जाता था.''
हालांकि, कुछ ही दूरी पर रहने वाले मीर अफ़जल गुलज़ार ने बताया, ''यहां कोई शिविर नहीं था और कोई चरमपंथी नहीं थे. यहां 1980 में मुजाहिदीन शिविर हुआ करता था लेकिन अब वो चला गया है.''
31 जनवरी, 2004 को विकीलीक्स द्वारा लीक किए गए अमरीकी विदेश मंत्रालय के एक मेमो में जिक्र है कि जाबा के पास जैश-ए-मोहम्मद का एक प्रशिक्षण शिविर है जहां हथियारों और विस्फोट का बेसिक और एडवांस प्रशिक्षण
दिया जाता है.
रॉयटर्स की रिपोर्ट
ब्रिटेन की न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स ने जाबा के दौरे के बाद लिखा है कि वहां हमले से घायल हुआ सिर्फ़ एक ही पीड़ित है, जिसकी दाईं आंख पर हमले के कारण चोट आई हुई है.
जाबा में ऊपरी ढालानों की तरफ़ इशारा करते हुए गांवों वालों ने बताया कि यहां चार बमों के गिरने के निशान हैं और देवदार के पेड़ बिखरे पड़े हैं.
इलाक़े में वैन चलाने वाले अब्दुर रशीद ने कहा, ''इसने सबकुछ हिलाकर रख दिया. यहां कोई नहीं मरा. सिर्फ कुछ देवदार के पेड़ गिरे हैं. एक कौआ मरा है.''
जाबा घने पहाड़ी और नदियों के इलाके में स्थित है जहां से कघान घाटी का रास्ता खुलता है. यह पाकिस्तानी पर्यटकों के लिए एक पसंदीदा पर्यटक स्थल है.
स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां 400 से 500 लोग मिट्टी के घरों में रहते हैं. रॉयटर्स ने 15 लोगों से बात की लेकिन नूरान शाह के अलावा किसी के भी हताहत होने की ख़बर नहीं मिली.
अब्दुर रशीद ने कहा, ''मैंने यहां कोई शव नहीं देखा, बस एक स्थानीय व्यक्ति ही किसी चीज़ से घायल हुआ है.''
भारत ने बालाकोट में चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षण शिविर को निशाना बनाने और वहाँ मौजूद सभी चरमपंथियों के मारे जाने का दावा किया था.
वहीं पाकिस्तान ने कहा था कि वहां कोई प्रशिक्षण शिविर है ही नहीं. भारत ने खाली जगह पर बम गिराए और पाकिस्तानी वायुसेना की जवाबी कार्रवाई के बाद भारत के लड़ाकू विमान भाग गए.
दोनों ही देशों के बीच जब ये दावे चल रहे थे तो मीडिया भी अपनी-अपनी बातें कह रहा था. कुछ मीडिया चैनल्स ने तो 300 चरमपंथियों के मारे जाने तक का दावा किया था.
ऐसी ख़बरें भी थीं कि बालाकोट में चरमपंथियों के लिए छह एकड़ का शिविर बना था जिसमें कई सुविधाएं थीं और चरमपंथियों को वहां हर तरह का प्रशिक्षण मिलता था. लेकिन, निष्पक्ष तौर पर इन दावों की पुष्टि नहीं हो पाई.
अपने दावे की पुष्टि करने के लिए पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया को हमले की जगह जाबा में आने के लिए आमंत्रित किया था. जाबा बालाकोट में स्थित है. पाकिस्तानी सेना की निगरानी में मीडिया को जाबा में ले जाया गया. वहां के
हालातों पर की गईं न्यूज़ रिपोर्ट का सार पढ़ें यहां:
भारतीय हवाई हमले के बाद बीबीसी संवाददाता सहर बलोच भी बालाकोट पहुंची थीं. उन्होंने इस हमले में घायल एक स्थानीय शख़्स नूरान शाह से बात की. उनका घर घटनास्थल के पास ही है.
नूरान शाह ने बताया, ''पिछली रात मैं सोया हुआ था. उनकी बहुत तेज आवाज़ से मैं जाग गया. जब मैं उठा तो बहुत तेज धमाका हुआ. जब ये धमाका हुआ तो मैंने बाहर निकलने की कोशिश की. मैंने कहा कि ये कोई ख़तरनाक काम है.
जब मैं दरवाजे के पास आया तो तीसरा धमाका हुआ. ये जगह 15 मीटर या उससे भी कम दूर होगी.''
''दूसरे धमाके के साथ ही दरवाजे टूट गए थे. तब मैं, मेरी बेटी और बीवी वहीं बैठ गए. मैंने कहा कि अब मरना ही है. उसके बाद चौथा धमाका थोड़ा नीचे हुआ तो हम उधर ही बैठे रहे. फिर थोड़ी देर बाद हम उठे, बाहर निकले तो देखा
कि मकान की दीवारें, छत वगैरह पर दरारें थीं. बस अल्लाह ने हमें बचा लिया. मेरे सिर पर थोड़ी सी चोट आई है. टांग और कमर पर थोड़ी चोटें हैं.''
पाकिस्तानी सेना के आने पर इलाक़े की आवाजाही पर क्या असर पर पड़ा इस संबंध में इलाक़े के एक छात्र ने बताया, ''सुबह से लोगों का यहां आना मना है. फौज की तरफ़ से रोका गया है.''
इसके अलावा खैबर पख्तूनख्वाह के हेल्थ केयर कमीशन ने यहां 100 बेड अलग किए हैं, जिसके बाद से हालात ख़राब होने का अनुमान लगाया जा रहा था.
अल जज़ीरा ने क्या लिखा
कतर के न्यूज़ ब्रॉडकास्टर अल जज़ीरा ने लिखा है कि बुधवार को हमले की जगह जाने के बाद अल जज़ीरा ने पाया कि उत्तरी पाकिस्तान के जाबा शहर के बाहर जंगल और दूर दराज के क्षेत्र में चार बम गिरे थे. विस्फोट से हुए गड्ढे में
टूटे हुए पेड़ और जगह-जगह पत्थर पड़े थे. लेकिन, वहां पर किसी भी तरह के मलबे और जान-माल के नुकसान का कोई सबूत नहीं था.''
स्थानीय अस्पतालों के अधिकारियों और उस जगह पर पहुंचे कई निवासियों ने बताया कि उन्हें भारतीय हमले के बाद वहां कोई शव या घायल लोग नहीं दिखे.
इलाक़े में जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षण शिविर को लेकर स्थिति साफ नहीं थी.
स्थानीय निवासियों ने बताया कि जहां बम गिराए गए वहां से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर, एक ढलान वाली चोटी पर एक मदरसा है जिसे जैश-ए-मोहम्मद चलाता है. कुछ दूरी पर लगे एक साइनबोर्ड से स्कूल की जगह की पुष्टि
हुई और यह सशस्त्र समूह द्वारा चलाया जा रहा था.
बोर्ड में मसूद अज़हर को तलीम-उल-क़ुरान मदरसे का प्रमुख और मोहम्मद युसूफ़ अज़हर को प्रशासक बताया गया था.
यहां कुछ लोगों का कहना था कि यह मदरसा स्थानीय स्कूल के बच्चों को पढ़ाता था लेकिन कुछ ने कहा कि वहां जैश के लड़ाकों का प्रशिक्षण केंद्र था.
एक व्यक्ति ने बिना पहचान ज़ाहिर किए बताया, ''पहाड़ पर बना मदरसा मुजाहिदीनों के लिए प्रशिक्षण शिविर था.''
31 साल के एक अन्य स्थानीय शख़्स ने कहा, ''हर कोई जानता था कि वहां जैश का शिविर है. वहां लोगों को लड़ना सिखाया जाता था.''
हालांकि, कुछ ही दूरी पर रहने वाले मीर अफ़जल गुलज़ार ने बताया, ''यहां कोई शिविर नहीं था और कोई चरमपंथी नहीं थे. यहां 1980 में मुजाहिदीन शिविर हुआ करता था लेकिन अब वो चला गया है.''
31 जनवरी, 2004 को विकीलीक्स द्वारा लीक किए गए अमरीकी विदेश मंत्रालय के एक मेमो में जिक्र है कि जाबा के पास जैश-ए-मोहम्मद का एक प्रशिक्षण शिविर है जहां हथियारों और विस्फोट का बेसिक और एडवांस प्रशिक्षण
दिया जाता है.
रॉयटर्स की रिपोर्ट
ब्रिटेन की न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स ने जाबा के दौरे के बाद लिखा है कि वहां हमले से घायल हुआ सिर्फ़ एक ही पीड़ित है, जिसकी दाईं आंख पर हमले के कारण चोट आई हुई है.
जाबा में ऊपरी ढालानों की तरफ़ इशारा करते हुए गांवों वालों ने बताया कि यहां चार बमों के गिरने के निशान हैं और देवदार के पेड़ बिखरे पड़े हैं.
इलाक़े में वैन चलाने वाले अब्दुर रशीद ने कहा, ''इसने सबकुछ हिलाकर रख दिया. यहां कोई नहीं मरा. सिर्फ कुछ देवदार के पेड़ गिरे हैं. एक कौआ मरा है.''
जाबा घने पहाड़ी और नदियों के इलाके में स्थित है जहां से कघान घाटी का रास्ता खुलता है. यह पाकिस्तानी पर्यटकों के लिए एक पसंदीदा पर्यटक स्थल है.
स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां 400 से 500 लोग मिट्टी के घरों में रहते हैं. रॉयटर्स ने 15 लोगों से बात की लेकिन नूरान शाह के अलावा किसी के भी हताहत होने की ख़बर नहीं मिली.
अब्दुर रशीद ने कहा, ''मैंने यहां कोई शव नहीं देखा, बस एक स्थानीय व्यक्ति ही किसी चीज़ से घायल हुआ है.''
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