जाने-माने अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के एक बयान को लेकर भारत में उनके विरोध और समर्थन में विवाद बढ़ा तो उसका असर अब पड़ोसी पाकिस्तान में भी दिख रहा है.
नसीरुद्दीन शाह ने इसी हफ़्ते देश में उन्मादी भीड़ के हाथों मारे जा रहे निर्दोष लोगों पर चिंता ज़ाहिर की थी.
नसीर ने कहा था कि ऐसा माहौल देख उन्हें चिंता होती है कि कहीं उनकी औलाद से कोई यह न पूछ दे कि वो हिन्दू है या मुसलमान. उन्होंने कहा था, ''मेरे बच्चे ख़ुद को क्या बताएंगे क्योंकि उन्हें तो धर्म की तालीम ही नहीं दी. मुझे इस माहौल से डर नहीं लगता बल्कि ग़ुस्सा आता है.''
नसीरुद्दीन के इस बयान पर देखते-देखते हंगामा खड़ा हो गया. बीजेपी के राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ने ट्वीट कर कहा कि नसीरुद्दीन देश को बदनाम कर रहे हैं.
सोशल मीडिया पर कई लोग नसीर को पाकिस्तान चले जाने की सलाह देने लगे. हालांकि कई लोगों ने नसीर का समर्थन भी किया. वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता ने नसीर का समर्थन करते हुए कहा कि उनकी चिंता बिल्कुल जायज़ है.
विवाद बढ़ा तो नसीर फिर सामने आए और कहा कि उन्होंने अपनी चिंता ज़ाहिर की थी और ऐसा करना कोई देशद्रोह नहीं होता. शाह ने कहा कि वो उस देश के प्रति चिंचा ज़ाहिर कर रहे थे, जिससे वो मोहब्बत करते हैं, यह जुर्म कैसे हो सकता है.
नसीरुद्दीन के इस बयान को लेकर भारत में प्रतिक्रिया की झड़ी लग गई. योग गुरु से कारोबारी बने रामदेव ने कहा कि ऐसे बोलने से भारत का गौरव दुनिया भर में कम होता है. बीजेपी समर्थक और जाने-माने अभिनेता अनुपम खेर ने भी नसीर के बयान का विरोध किया.
अजमेर में लिटरेचल फ़ेस्टिवल के आयोजकों ने बढ़ते विवाद को देखते हुए नसीरुद्दीन शाह से कह दिया कि वो यहां आने से बचें क्योंकि तोड़फोड़ का सामना करना पड़ सकता है.
हालांकि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ट्वीट कर कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आयोजकों ने नसीर से ऐसा कहा. गहलोत ने कहा कि प्रशासन उनकी सुरक्षा के लिए पूरी तरह से मुस्तैद था.
भारत में नसीर को लेकर विवाद बढ़ ही रहा था कि पाकिस्तान भी इसमें कूद गया. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने शनिवार को लाहौर में कह दिया कि जिन्ना ने जो कहा था वो बिल्कुल सही बात थी कि भारत में मुसलमानों को बराबर का अधिकार नहीं मिलेगा इसलिए वो पाकिस्तान चाहते हैं.
पीएम ख़ान ने यहां तक कह दिया कि वो प्रधानमंत्री मोदी को बताएंगे कि अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है.
Sunday, December 23, 2018
Wednesday, December 12, 2018
加拿大前外交官康明凯中国被捕,中国暗示其“非法活动”
国际危机组织高级顾问、前加拿大外交官康明凯(Michael Kovrig)在中国遭到拘留。中国外交部周三(12月12日)回应称,由于国际危机组织在中国并未备案,康明凯在中国活动已经触犯中国的境外NGO管理法。
中国于2017年1月1日开始正式实施《境外非政府组织(NGO)境内活动管理法》规定,境外非政府组织,包括慈善及环保团体,在中国要向警方登记才可工作,警方有权调查这些机构。
在康明凯被捕之前,华为首席财务官孟晚舟12月1日在加拿大被捕,引发外界对于中国进行“报复”的猜测,给中加美三国紧张的外交关系更添变数。
康明凯是国际危机组织(International Crisis Group)的东北亚高级顾问。路透社报道称,他周一(12月10日)在北京遭到国安人员拘留。
中国外交部发言人陆慷周三(12月12日)在记者会上说,据他了解,国际危机组织在中国没有备案。因此,康明凯在中国从事未经注册的“相关活动”,“就已经违反了中国的境外NGO活动管理法”。
此前,国际危机组织发表声明称,该组织正尽一切可能,获取有关康明凯下落的更多消息,以寻求他迅速和安全地获释。
加拿大总理特鲁多对记者称,他已了解到加拿大公民在中国被捕的情况。他还表示,加拿大正就此案与中国当局直接接触,“我们在着手准备文件,我们很重视这件事。”
康明凯被捕正值华为孟晚舟事件持续发酵之时,引发人们对于这是否是中国当局报复行动的猜测。不过,孟晚舟已于加拿大当地时间周二获准保释。
中国于2017年1月1日开始正式实施《境外非政府组织(NGO)境内活动管理法》规定,境外非政府组织,包括慈善及环保团体,在中国要向警方登记才可工作,警方有权调查这些机构。
在康明凯被捕之前,华为首席财务官孟晚舟12月1日在加拿大被捕,引发外界对于中国进行“报复”的猜测,给中加美三国紧张的外交关系更添变数。
康明凯是国际危机组织(International Crisis Group)的东北亚高级顾问。路透社报道称,他周一(12月10日)在北京遭到国安人员拘留。
中国外交部发言人陆慷周三(12月12日)在记者会上说,据他了解,国际危机组织在中国没有备案。因此,康明凯在中国从事未经注册的“相关活动”,“就已经违反了中国的境外NGO活动管理法”。
此前,国际危机组织发表声明称,该组织正尽一切可能,获取有关康明凯下落的更多消息,以寻求他迅速和安全地获释。
加拿大总理特鲁多对记者称,他已了解到加拿大公民在中国被捕的情况。他还表示,加拿大正就此案与中国当局直接接触,“我们在着手准备文件,我们很重视这件事。”
康明凯被捕正值华为孟晚舟事件持续发酵之时,引发人们对于这是否是中国当局报复行动的猜测。不过,孟晚舟已于加拿大当地时间周二获准保释。
Sunday, December 9, 2018
पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने मोदी-जेटली को कितना घेरा
नरेंद्र मोदी सरकार नोटबंदी को लेकर लगातार आलोचना झेल रही है. सरकार की मुश्किल ये है कि उसने नोटबंदी के लिए जितने भी दावे किए, वे खरे नहीं उतरे.
यही वजह है कि जो मोदी सरकार अपने हर काम का जोरशोर से प्रचार करने में यक़ीन करती है, उसने नोटबंदी के दो साल पूरे होने पर इसका जश्न नहीं मनाया.
अब तो भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने भी नोटबंदी को देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका बताया है.
जब नोटबंदी का फ़ैसला हुआ तब अरविंद ही देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे और वो चार साल तक इस अहम पद पर रहे.
उन्होंने 8 नवंबर, 2016 को नरेंद्र मोदी की नोटबंदी की घोषणा के बारे में लिखा है, "कल्पना से परे ये एक ऐसा क़दम था, जिसे मौजूदा समय में सामान्य परिस्थितियों में किसी भी अर्थव्यवस्था ने नहीं अपनाया है."
अरविंद सुब्रमण्यम ने अपने चार साल के कार्यकाल के अनुभवों को लेकर किताब लिखी है. पेंगुइन से छपी किताब 'ऑफ़ काउंसिल- द चैलेंज्स ऑफ़ द मोदी-जेटली इकॉनमी' में नोटबंदी पर सुब्रमण्यम ने एक पूरा अध्याय लिखा है.
नोटबंदी के दो साल बीतने के बाद भी इस पर होने वाली चर्चाओं के बारे में सुब्रमण्यम ने बताया है कि चर्चाएं इसलिए भी होती हैं क्योंकि अब तक यह फ़ैसला लेने की वजहों को लेकर रहस्य बना हुआ है.
नोटबंदी के दो रहस्य
वैसे सुब्रमण्यम ने ये नहीं ज़ाहिर होने दिया है कि नोटबंदी का फ़ैसला जब लिया गया तब बतौर मुख्य आर्थिक सलाहकार उनकी अपनी क्या भूमिका थी और सरकार में किन लोगों के बीच ये फ़ैसला लिया गया.
बहरहाल, वो सरकार में रहते हुए जिस ओर शायद इशारा नहीं कर पाए, उस ओर इशारा उन्होंने किताब में कर दिया है. नोटबंदी पर उनकी किताब में चैप्टर का शीर्षक ही है- द टू पज़ल्स ऑफ़ डिमोनेटाइजेशन- पॉलिटिकल एंड इकॉनामिक.
उन्होंने नोटबंदी और उसके असर को दो पहेली के ज़रिए समझाने की कोशिश की है. पहली पहेली यही है कि अगर नोटबंदी से आर्थिक नुक़सान हुआ तो राजनीतिक तौर पर ये इतना लोकप्रिय कैसे रहा? अगर आम लोगों को इतनी मुश्किल झेलनी पड़ी तो फिर उत्तर प्रदेश चुनाव में बीजेपी को जीत कैसे मिली?
हो सकता है, ये सवाल आपके मन में भी घुमड़ता रहा हो तो इसका बेहद दिलचस्प जवाब अरविंद सुब्रमण्यम ने दिया है, वो भी अमरीकी इतिहासकार थॉमस फ्रैंक की किताब व्हाट द मैटर विद कांज़ास के हवाले से.
दरअसल ये पुस्तक इस बात की पड़ताल करती है कि अमूमन लोग अपने आर्थिक हितों के एकदम विपरीत जाकर अपना वोट देते हैं.
इसका एक दिलचस्प उदाहरण है कि किस तरह अमरीकी गोरों ने रिपब्लिकन पार्टी और डोनल्ड ट्रंप को वोट दिया जबकि उनकी नीतियों से इन लोगों को कोई फ़ायदा नहीं होने वाला था. उल्टे उनका नुक़सान होने वाला था क्योंकि ओबामा केयर जैसी दूसरी जनकल्याण की सुविधाओं को ट्रंप वापस लेने वाले थे.
अप्रभावी तरीका था नोटबंदी
उन्होंने इसी पहेली के जवाब में ये भी लिखा है कि नोटबंदी के दौरान ग़रीब लोग अपनी मुश्किल से ज़्यादा अमीरों की होने वाली मुश्किल को लेकर ख़ुश थे. हालांकि अरविंद सुब्रमण्यम ने ये साफ़ लिखा है कि अमीरों पर अंकुश लगाने के दूसरे तमाम तरीक़े मौजूद थे, ऐसे में निर्दोष और ग़रीब लोगों को क्यों इसमें फंसाया गया.
यही वजह है कि जो मोदी सरकार अपने हर काम का जोरशोर से प्रचार करने में यक़ीन करती है, उसने नोटबंदी के दो साल पूरे होने पर इसका जश्न नहीं मनाया.
अब तो भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने भी नोटबंदी को देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका बताया है.
जब नोटबंदी का फ़ैसला हुआ तब अरविंद ही देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे और वो चार साल तक इस अहम पद पर रहे.
उन्होंने 8 नवंबर, 2016 को नरेंद्र मोदी की नोटबंदी की घोषणा के बारे में लिखा है, "कल्पना से परे ये एक ऐसा क़दम था, जिसे मौजूदा समय में सामान्य परिस्थितियों में किसी भी अर्थव्यवस्था ने नहीं अपनाया है."
अरविंद सुब्रमण्यम ने अपने चार साल के कार्यकाल के अनुभवों को लेकर किताब लिखी है. पेंगुइन से छपी किताब 'ऑफ़ काउंसिल- द चैलेंज्स ऑफ़ द मोदी-जेटली इकॉनमी' में नोटबंदी पर सुब्रमण्यम ने एक पूरा अध्याय लिखा है.
नोटबंदी के दो साल बीतने के बाद भी इस पर होने वाली चर्चाओं के बारे में सुब्रमण्यम ने बताया है कि चर्चाएं इसलिए भी होती हैं क्योंकि अब तक यह फ़ैसला लेने की वजहों को लेकर रहस्य बना हुआ है.
नोटबंदी के दो रहस्य
वैसे सुब्रमण्यम ने ये नहीं ज़ाहिर होने दिया है कि नोटबंदी का फ़ैसला जब लिया गया तब बतौर मुख्य आर्थिक सलाहकार उनकी अपनी क्या भूमिका थी और सरकार में किन लोगों के बीच ये फ़ैसला लिया गया.
बहरहाल, वो सरकार में रहते हुए जिस ओर शायद इशारा नहीं कर पाए, उस ओर इशारा उन्होंने किताब में कर दिया है. नोटबंदी पर उनकी किताब में चैप्टर का शीर्षक ही है- द टू पज़ल्स ऑफ़ डिमोनेटाइजेशन- पॉलिटिकल एंड इकॉनामिक.
उन्होंने नोटबंदी और उसके असर को दो पहेली के ज़रिए समझाने की कोशिश की है. पहली पहेली यही है कि अगर नोटबंदी से आर्थिक नुक़सान हुआ तो राजनीतिक तौर पर ये इतना लोकप्रिय कैसे रहा? अगर आम लोगों को इतनी मुश्किल झेलनी पड़ी तो फिर उत्तर प्रदेश चुनाव में बीजेपी को जीत कैसे मिली?
हो सकता है, ये सवाल आपके मन में भी घुमड़ता रहा हो तो इसका बेहद दिलचस्प जवाब अरविंद सुब्रमण्यम ने दिया है, वो भी अमरीकी इतिहासकार थॉमस फ्रैंक की किताब व्हाट द मैटर विद कांज़ास के हवाले से.
दरअसल ये पुस्तक इस बात की पड़ताल करती है कि अमूमन लोग अपने आर्थिक हितों के एकदम विपरीत जाकर अपना वोट देते हैं.
इसका एक दिलचस्प उदाहरण है कि किस तरह अमरीकी गोरों ने रिपब्लिकन पार्टी और डोनल्ड ट्रंप को वोट दिया जबकि उनकी नीतियों से इन लोगों को कोई फ़ायदा नहीं होने वाला था. उल्टे उनका नुक़सान होने वाला था क्योंकि ओबामा केयर जैसी दूसरी जनकल्याण की सुविधाओं को ट्रंप वापस लेने वाले थे.
अप्रभावी तरीका था नोटबंदी
उन्होंने इसी पहेली के जवाब में ये भी लिखा है कि नोटबंदी के दौरान ग़रीब लोग अपनी मुश्किल से ज़्यादा अमीरों की होने वाली मुश्किल को लेकर ख़ुश थे. हालांकि अरविंद सुब्रमण्यम ने ये साफ़ लिखा है कि अमीरों पर अंकुश लगाने के दूसरे तमाम तरीक़े मौजूद थे, ऐसे में निर्दोष और ग़रीब लोगों को क्यों इसमें फंसाया गया.
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