Sunday, December 9, 2018

पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने मोदी-जेटली को कितना घेरा

नरेंद्र मोदी सरकार नोटबंदी को लेकर लगातार आलोचना झेल रही है. सरकार की मुश्किल ये है कि उसने नोटबंदी के लिए जितने भी दावे किए, वे खरे नहीं उतरे.

यही वजह है कि जो मोदी सरकार अपने हर काम का जोरशोर से प्रचार करने में यक़ीन करती है, उसने नोटबंदी के दो साल पूरे होने पर इसका जश्न नहीं मनाया.

अब तो भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने भी नोटबंदी को देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका बताया है.

जब नोटबंदी का फ़ैसला हुआ तब अरविंद ही देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे और वो चार साल तक इस अहम पद पर रहे.

उन्होंने 8 नवंबर, 2016 को नरेंद्र मोदी की नोटबंदी की घोषणा के बारे में लिखा है, "कल्पना से परे ये एक ऐसा क़दम था, जिसे मौजूदा समय में सामान्य परिस्थितियों में किसी भी अर्थव्यवस्था ने नहीं अपनाया है."

अरविंद सुब्रमण्यम ने अपने चार साल के कार्यकाल के अनुभवों को लेकर किताब लिखी है. पेंगुइन से छपी किताब 'ऑफ़ काउंसिल- द चैलेंज्स ऑफ़ द मोदी-जेटली इकॉनमी' में नोटबंदी पर सुब्रमण्यम ने एक पूरा अध्याय लिखा है.

नोटबंदी के दो साल बीतने के बाद भी इस पर होने वाली चर्चाओं के बारे में सुब्रमण्यम ने बताया है कि चर्चाएं इसलिए भी होती हैं क्योंकि अब तक यह फ़ैसला लेने की वजहों को लेकर रहस्य बना हुआ है.

नोटबंदी के दो रहस्य

वैसे सुब्रमण्यम ने ये नहीं ज़ाहिर होने दिया है कि नोटबंदी का फ़ैसला जब लिया गया तब बतौर मुख्य आर्थिक सलाहकार उनकी अपनी क्या भूमिका थी और सरकार में किन लोगों के बीच ये फ़ैसला लिया गया.

बहरहाल, वो सरकार में रहते हुए जिस ओर शायद इशारा नहीं कर पाए, उस ओर इशारा उन्होंने किताब में कर दिया है. नोटबंदी पर उनकी किताब में चैप्टर का शीर्षक ही है- द टू पज़ल्स ऑफ़ डिमोनेटाइजेशन- पॉलिटिकल एंड इकॉनामिक.

उन्होंने नोटबंदी और उसके असर को दो पहेली के ज़रिए समझाने की कोशिश की है. पहली पहेली यही है कि अगर नोटबंदी से आर्थिक नुक़सान हुआ तो राजनीतिक तौर पर ये इतना लोकप्रिय कैसे रहा? अगर आम लोगों को इतनी मुश्किल झेलनी पड़ी तो फिर उत्तर प्रदेश चुनाव में बीजेपी को जीत कैसे मिली?

हो सकता है, ये सवाल आपके मन में भी घुमड़ता रहा हो तो इसका बेहद दिलचस्प जवाब अरविंद सुब्रमण्यम ने दिया है, वो भी अमरीकी इतिहासकार थॉमस फ्रैंक की किताब व्हाट द मैटर विद कांज़ास के हवाले से.

दरअसल ये पुस्तक इस बात की पड़ताल करती है कि अमूमन लोग अपने आर्थिक हितों के एकदम विपरीत जाकर अपना वोट देते हैं.

इसका एक दिलचस्प उदाहरण है कि किस तरह अमरीकी गोरों ने रिपब्लिकन पार्टी और डोनल्ड ट्रंप को वोट दिया जबकि उनकी नीतियों से इन लोगों को कोई फ़ायदा नहीं होने वाला था. उल्टे उनका नुक़सान होने वाला था क्योंकि ओबामा केयर जैसी दूसरी जनकल्याण की सुविधाओं को ट्रंप वापस लेने वाले थे.

अप्रभावी तरीका था नोटबंदी
उन्होंने इसी पहेली के जवाब में ये भी लिखा है कि नोटबंदी के दौरान ग़रीब लोग अपनी मुश्किल से ज़्यादा अमीरों की होने वाली मुश्किल को लेकर ख़ुश थे. हालांकि अरविंद सुब्रमण्यम ने ये साफ़ लिखा है कि अमीरों पर अंकुश लगाने के दूसरे तमाम तरीक़े मौजूद थे, ऐसे में निर्दोष और ग़रीब लोगों को क्यों इसमें फंसाया गया.

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